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केरल बाढ़ पर पाखंड क्यों?

photo-pti आजकल सोशल मीडिया पर केरल बाढ़ को लेकर एक अलग नजारा देखने को मिल रहा है। प्रत्येक घटना की तरह केरल की इस भीषण बाढ़ में जिसने ना जाने कितने लोगों की जान छीन ली है के बावजूद भी दो गुट बन गए हैं। एक गुट केरल की इस बाढ़ में वहां के लोगों के साथ खड़ा है। वहीं दूसरा गुट अपनी एक अलग किस्म की पहचान बनाते हुए लोगों द्वारा की जा रही मदद के विरोध में खड़ा है। मदद ना करना यह एक अलग पहलू हो सकता है लेकिन जो लोग मदद के लिए  हाथ बढ़ा रहे हैं उनको रोकना एक भयावह स्थिति को प्रकट करता है, जो कि हमारे देश की एकता व अखंडता के लिए बेहतर नहीं है। दरसल सोशल मीडिया पर केरल बाढ़ को लेकर एक अलग किस्म के किस्से गढ़े जा रहे हैं जो ना तो किसी वैज्ञानिक अवधारणा को अपने में समेटे हैं और ना ही वह तार्किक हैं। क्योंकि केरल की बाढ़ का गाय माता से क्या तात्पर्य? आप सोच रहे होंगे यह गाय माता बीच में कहां से आ गई। तो मैं आपको बताता चलूं कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैला रहे हैं कि केरल के लोग गाय का मांस खाते हैं इसलिए जो बाढ़ आई है य ह इसी पाप का नतीजा है।  लोग यही नहीं रुके वह इस बाढ़ को...

मौलाना का थप्पड़ और टीवी डिबेट का गिरता स्तर।

वर्तमान में भारतीय परिदृश्य को देखते हुए यह लगता है कि 130 करोड़ की जनता को धर्म पर बहस कुछ ज्यादा ही भाँती है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रत्येक शाम को ताल ठोक के, से लेकर अनेक टीवी प्रोग्राम धर्म से संबंधित नहीं होते। टीवी चैनल तो अपना काम कर रहे हैं लेकिन हम क्यों यह देखना चाहते हैं शायद किसी को पता नहीं। धार्मिक कर्मकांडों ने हम मनुष्य को इतना जकड़ लिया है कि किसी भी प्रकार से धर्म की बुराई बर्दाश्त ही नहीं कर सकते। धर्म से संबंधित कोई एक ही टिप्पड़ी कर दे तो बेचारे की जान पर आ जाती है।                          जी हिंदुस्तान नामक चैनल पर जब बहस चल रही थी तो एक महिला व एक मौलाना के बीच आपसी झड़प ने ऐसा माहौल बनाया कि पूरा देश सकते में आ गया। इस प्रकार का वाकया कोई पहली बार नहीं हुआ है। पिछले कई सालों से ऐसी झड़पें लाइव टीवी शो पर देखने को मिल ही जाती हैं। अब सवाल उठता है कि न्यूज़ चैनल इस प्रकार की मानशिकता वाले लोगों को बुलाते ही क्यों हैं? लेकिन तभी आर्थिक पहलू याद...

कठुआ और उन्नाव बनाम समाज

मां मैं जा रही हूं..... शायद आसिफा के यही आखरी शब्द होंगे जब वह अपने घोड़ों को लेकर जंगल की ओर चराने के लिए गई होगी। कौन जानता था कि अब वह कभी भी लौट के नहीं आएगी? कौन जानता था कि उसके साथ एक पवित्र जगह पर इतना जघन्य अपराध किया जाएगा? एक 8 साल की मासूम बच्ची जिसको अभी अपना बायां और दायां हाथ तक पता नहीं था उसके साथ 8 दिनों तक एक पवित्र जगह पर ऐसा खेल खेला गया कि पूरी मानवता ही शर्मशार हो गई। वह मर ही गई थी लेकिन अभी कुछ बाकी था। अभी वह पुलिसवाला अपनी हवस को मिटाना चाहता था... रुको रुको अभी मारना नहीं मुझे भी हवस बुझानी है। यह खेल ही था जिसमें कुछ दरिंदे थे और एक मासूम बच्ची। जाहिर है कठुआ की खबर जैसे ही देश में फैली वह लोगों के रोंगटे खड़े कर गई। लेकिन इसके बाद भी कुछ तथाकथित हिंदुत्ववादी लोग उन दरिन्दों के  बचाव में  सड़कों पर उतर आए जिन्होंने 8 साल की मासूम बच्ची के साथ ड्रग्स देकर बलात्कार किया। शायद वह उस बच्ची में धर्म तलाश कर रहे थे जो अभी मंदिर मस्जिद को ही सही मायने में नहीं पहचान पायी थी। पहचानती भी कैसे अभी तो वह वोट देने के काबिल भी नहीं हुई थी। मैंने भी जब खबर देख...

महिला सशक्तिकरण के मायने!!

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में जब कुछ बुद्धजीवियों द्वारा महिलावादी उपागम को मजबूती के साथ समाज में फैलाने का काम प्रारंभ किया गया। तो शायद सबको लगा होगा कि अब महिलाओं की स्थिति बदल जाएगी। अब वह समाज में व्याप्त स्त्री-पुरुष के भेदभाव से दूर हो जाएगी। अब वह अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर पाएगी। अब वह संपत्ति पर अपना हक जमा पाएगी। परंतु इतने सालों में महिला सशक्तिकरण के लिए किए गए कार्यों के पश्चात भी क्या कुछ बदला? आज भी भाषणों, किताबों, लेखों में सिर्फ बातें ही होती हैं और वास्तविक स्थिति एक भिन्न प्रकार से बदल रही है। इस स्थिति को हम 1 साल पहले आई संजय दत्त की भूमि फिल्म से समझ सकते हैं। इस फिल्म में संजय दत्त अपनी बेटी को बेटे से कमतर बिल्कुल नहीं मानता परंतु सामाजिक व्यवस्था के आगे वह बेबस हो जाता है। इस फिल्म ने भारतीय परम्परा की कुछ ना हजम होने वाली बातों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। इसमें दिखाया गया है कि जहां हम एक ओर स्त्री को देवी मानकर पूजा करते हैं वहीं दूसरी ओर गणेश जी की आरती "बांझन को पुत्र दे निर्धन को माया" में स्त्री को अत्...

कासगंज का सच?

अक्सर लोगों द्वार यह सुनने को मिलता है कि अमेरिका का लोकतंत्र सबसे पुराना तो है लेकिन भारत का लोकतंत्रीय स्वरूप नया होते हुए भी दुनिया को एक मिसाल पेश कर रहा है। यहां इतनी विविधता के होते हुए भी लोग लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाते जा रहे हैं। आपस में कदम से कदम मिलाकर यहां के लोग भारत को ना केवल जमीन पर बल्कि अंतरिक्ष तक विश्व के सामने एक बेहतरी के साथ खड़ा कर रहे हैं । परंतु कुछ उपद्रवी लोगों द्वारा समाज में एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा कर देश को पीछे धकेलने का काम किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य के कासगंज में भी कुछ उपद्रवियों द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर माहौल को खराब करने की कोशिश की गई और वह थोड़े बहुत कामयाब भी हुए। ये उपद्रवी केवल एक धर्म या जाति में नहीं हैं बल्कि प्रत्येक जगह कुछ मात्रा में मिल जाते हैं जो कि पूरे  समाज को नकारात्मक दिशा की ओर मोड़ देते हैं।                                   गणतंत्र दिवस के मौके पर उत्तर प्रदेश के कासगंज में कुछ ऐसा ही देखने को मिला जहां  ...

करणी सेना और सांप्रदायिक आतंकवाद

कहने के लिए तो देश में लोकतंत्र और संविधान के निर्देशानुसार शासन व्यवस्था चलाई जा रही है। परंतु समाज में व्याप्त कुछ ऐसे सांप्रदायिक तत्व अपना मुंह ऊपर उठाए खड़े रहते है...

क्या आपका आधार सुरक्षित है?

आज से कोई 7 साल पहले जब 2010 में आधार कार्ड बनने प्रारंभ हुए तब बड़ी उत्सुकता से लोगों ने अपनी भागीदारी सुनिश्चित कराई। तब शायद किसी के मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा हो कि उंगलियों ...