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लोक लुभावन और लोकतंत्र

गांधीजी और मैकियावेली ने मनुष्य के प्रति जो अपनी विचारधारा बनाई वह समुद्र के दो किनारों के जैसे थी। जहां गांधी जी मनुष्य को जन्म के आधार पर एक दयालू, ईमानदार और परोपकारी प्राणी मानते हैं वहीं मैकियावेली मनुष्य को उसके कार्यों के आधार पर स्वार्थी, क्रूर बताने का प्रयास करता है। हालांकि मैकियावेली की यह बात गलत ही साबित होती है कि मनुष्य हमेशा ही क्रूर होता है क्योंकि ऐसे तमाम लोग हुए जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सामाजिक कार्यों, मानवता के लिए त्याग दिया चाहे वह नेल्सन मंडेला हों या महात्मा गांधी ।                                 वर्तमान समय में विश्व में लगभग सभी देश लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना चुके हैं ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि लोगों के अधिकार और मानवता की बात हो परंतु परमाणु हथियार के युग में राष्ट्र हित और अपना हित अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो चुका है। आजकल लोकलुभावन जो कि अंग्रेजी के पॉपुलिस्म शब्द से निकल के आया है लोकतंत्र के ...

आय असमानता

मनुष्य विवेकशील प्राणी होने के नाते निरंतर अपने विकास की ओर अग्रसर रहता है। और शायद यही कारण है कि मनुष्य निरंतर दूसरों से बेहतर करने का प्रयास करता रहता है। यद्यपि यह एक स...

बारिश का बदलता स्वरूप।

यदि आप एक किसान की बात करेंगे तो उसके लिए जितनी आवश्यकता खाद्य पदार्थों ,बीजों की है उतनी ही आवश्यकता पानी की भी है। वर्तमान में जब तकनीकी इतनी आगे बढ़ गई है तब भी बिना अच्छे मानसून के ना केवल खेती-बाड़ी में बल्कि देश की जीडीपी में भी सकारात्मक प्रभाव देखनो को नहीं मिल सकता। देश की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मानसून की आवश्यकता होती है ।किसी भी देश की भौगोलिक स्थिति ही वहाँ की सामाजिक ,आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक व्यवस्था की स्थिति तय करती है। वर्तमान में जब मानसून में परिवर्तन देखने को मिल रहा है तो जाहिर है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक ,राजनीतिक परिवर्तन भी देखने को मिलेंगे।                    आई आई टी बॉम्बे की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 1917 से 2013 के बीच जहाँ वर्षा की मात्रा में राजस्थान में 9:00 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है वहीं गुजरात में इसमें 26.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। इस रिपोर्ट  के पश्चात एक अमेरिकी शोध...

नितीश का इस्तीफा और गठबंधन की राजनीति

जब हम एक लोकतंत्र की बात करते हैं तब इस व्यवस्था में निर्णय, कार्य, समझोते एक सहयोगात्मक भावना से होने चाहिये ना कि एक व्यक्ति विशेष के तानाशाही निर्णय से। शायद यही कारण है ...