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21वी सदी में भारतीय मीडिया?

              21वीं सदी में भारतीय मीडिया हमारे मीडिया में पैसा कमाने के लिए हाल में जिस तरह से राजनीति और आर्थिक खबरों को तोड़ा मरोड़ा गया यह प्रवृत्ति हमारी राजनीति और अर...

मीडिया का खेल जारी है?

2009 के लोकसभा और कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में जब मीडिया और विज्ञापन उद्योग के प्रतिनिधि रेट कार्ड लेकर उम्मीदवारों और पार्टियों के पास पहुंचे और समाचारों को बेचने का प...

राहुल जी का मंदिर दर्शन और मोदी जी का मस्जिद प्रेम कुछ कह रहा है?

2019 के चुनाव में भले ही थोड़ा समय हो लेकिन उसकी आहट ने पार्टियों से लेकर नेताओं को जगा तो दिया ही है। भले ही 2014 के बाद हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार ना मिला हो लेकिन आने वाले चुनाव को देखकर ऐसा लग रहा है कि नेताओं को तो कम से क म एक बढ़िया रोजगार मिल ही गया है। यही नहीं माननीय नेता जी के साथ-साथ उन युवाओं को भी दिहाड़ी मजदूरी मिल ही जाएगी जो तैयार बैठे हैं नेता जी की रैली में जाने के लिए। इस रैली में जाने के लिए युवा फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में काफी तैयारी भी कर चुके हैं। पिछले दिनों राहुल जी के मंदिर प्रवेश को लेकर इतनी गहन चर्चाएं हुईं इन यूनिवर्सिटीज में कि ऐसा लगा मानो दुनिया का सबसे बड़ा वाद-संवाद यहीं हो रहा हो और यह सबसे बड़ा मुद्दा भी हो। photo;pti इस गहन चर्चा का संवाद यह निकला कि राहुल गांधी को भी प्रूफ करना पड़ा कि भाई हम भी हिंदू ही हैं भले ही थोड़े उदारवादी ही सही। इसको लेकर राहुल गांधी इतने गंभीर हो गए कि उनको मानसरोवर की यात्रा भी करनी पड़ी। अब ऐसी ही कुछ गहन चर्चा मोदी जी के मस्जिद प्रवेश पर भी हो रही है। यदि आपको पता नहीं कि मोदी जी ...

क्या सत्ता पाने के लिए एकमात्र रास्ता बहुमत को खुश करना ही बचा है

पिछले दिनों खबर आयी कि राहुल गांधी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए हैं। इसको लेकर जहां कांग्रेस काफी उत्साहित दिखी तो वहीं भारतीय जनता पार्टी के अंदर एक बेचैनी का माहौल देखा जा सकता है। आखिर यह बेचैनी क्यों? क्या राहुल गांधी इस यात्रा से एक नए अवतार में आएंगे जिससे आने वाले 2019 के लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सामना करने में असमर्थ होगी या फिर कुछ और ही मसला है। आपको याद होगा गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी के मंदिर जाने को लेकर बड़ा घमासान हुआ था। तब भी बेचैनी ही थी.... और अब भी। लेकिन इससे एक सवाल यह उभरता है कि क्या जनता इस प्रकार के क्रियाकलापों से खुश होकर पार्टियों को सत्ता थमा देती है? आप सोच रहे होंगे ऐसा तो नहीं है। तो फिर क्या राहुल गांधी ने वास्तव में धार्मिक भावना से ही मंदिरों में आना-जाना लगाया है क्योंकि इसके पहले तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा था। या फिर कांग्रेस को लोगों ने जो अल्पसंख्यक वर्ग की पार्टी का दर्जा दे दिया है उसको बदलने के लिए राहुल गांधी अलग-अलग मंदिरों में माथा टेकने पहुंच रहे हैं। PHOTO: NDTV राहुल गांधी की कैलाश य...

तो क्या अब सरकार पहले युवाओं को तैयार करेगी फिर अगले कार्यकाल में रोजगार देगी?

वर्तमान समय में पूंजीवाद के एक नए रूप ने रोजगार रूपी पहलू पर कहीं-ना-कहीं सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है ।प्रत्येक साल ना जाने कितनी रिपोर्ट प्रकाशित होती हैं जो बेरोजगारी पर नए-नए डाटा हमारे सामने लाती हैं।रोजगार के विषय पर हम एक बार पुनः सोचने पर मजबूर हुए जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि रोजगार की नहीं अपितु योग्य उम्मीदवार की कमी है।योगी जी ने एक टीवी चैनल को अपने दिए गए साक्षात्कार में कहा कि 137000 शिक्षकों की नियुक्ति की जानी है लेकिन योग्य उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे हैं, जो परीक्षा पास करें और नौकरी करें।इसके साथ-साथ उन्होंने पुलिस विभाग का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने बताया कि लाखों पद खाली पड़े हैं।योगी जी की इस बात से हम सहमत भी हो सकते हैं कि शायद योग्य उम्मीदवार ना हों लेकिन कई प्रश्न हैं जो सोचने पर मजबूर तो कर ही देते हैं कि क्या वाकई योग्य उम्मीदवार नहीं हैं या फिर कुछ अलग ही मसला है। मसला नंबर एक:  मसलों में सबसे बड़ा मसला तो यही है कि क्या सरकार अब अपने बचे हुए कार्यकाल के दौरान युवाओं को योग्य बनाएगी और उसके बाद अगले कार्यकाल में नौक...

केरल बाढ़ पर पाखंड क्यों?

photo-pti आजकल सोशल मीडिया पर केरल बाढ़ को लेकर एक अलग नजारा देखने को मिल रहा है। प्रत्येक घटना की तरह केरल की इस भीषण बाढ़ में जिसने ना जाने कितने लोगों की जान छीन ली है के बावजूद भी दो गुट बन गए हैं। एक गुट केरल की इस बाढ़ में वहां के लोगों के साथ खड़ा है। वहीं दूसरा गुट अपनी एक अलग किस्म की पहचान बनाते हुए लोगों द्वारा की जा रही मदद के विरोध में खड़ा है। मदद ना करना यह एक अलग पहलू हो सकता है लेकिन जो लोग मदद के लिए  हाथ बढ़ा रहे हैं उनको रोकना एक भयावह स्थिति को प्रकट करता है, जो कि हमारे देश की एकता व अखंडता के लिए बेहतर नहीं है। दरसल सोशल मीडिया पर केरल बाढ़ को लेकर एक अलग किस्म के किस्से गढ़े जा रहे हैं जो ना तो किसी वैज्ञानिक अवधारणा को अपने में समेटे हैं और ना ही वह तार्किक हैं। क्योंकि केरल की बाढ़ का गाय माता से क्या तात्पर्य? आप सोच रहे होंगे यह गाय माता बीच में कहां से आ गई। तो मैं आपको बताता चलूं कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैला रहे हैं कि केरल के लोग गाय का मांस खाते हैं इसलिए जो बाढ़ आई है य ह इसी पाप का नतीजा है।  लोग यही नहीं रुके वह इस बाढ़ को...

मीडिया, लोकतंत्र और पत्रकार?

जब हमको लोकतंत्र और मीडिया के बारे में ABCD भी नहीं पता थी, तब  ही हमारे दिमाग में एक शब्द गढ़ दिया गया था। यह सब्द था चतुर्थ स्तंभ जो कि स्वतंत्र मीडिया के लिए था। हमको बचपन से ही यही सिखाया गया कि मीडिया लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है बल्कि यहां तक बताया गया कि जब मीडिया कमजोर होगा तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा। यह सही भी है लेकिन क्या वर्तमान या भूतपूर्व की सरकारों ने लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना योगदान दिया क्योंकि चाहे वह कांग्रेस की सरकार रही हो, बीजेपी की या क्यों ना कोई क्षेत्रीय पार्टी सभी ने सदैव लोकतंत्र की मजबूती का ही बोल बोला है। अब यदि सभी पार्टियां लोकतंत्र को एक मजबूत स्थिति की ओर ले जाना चाह रही हैं तो जाहिर है कि वह मीडिया को स्वतंत्र रूप से काम करने में भी अपनी टांग नहीं अड़ाना चाहेंगी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है जो सरकारें हमको दिखाना चाह रही हैं? यदि आपको लगता है ऐसा नहीं है तो जाहिर है मीडिया की स्वतंत्रता खतरे में है, और जब मीडिया खतरे में है तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रह सकता है? क्योंकि यदि चतुर्थ खंभा डहा तो लोकतंत्र के तीन अन्य खं भे किस रूप में रहेंगे...