2009 के लोकसभा और कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में जब मीडिया और विज्ञापन उद्योग के प्रतिनिधि रेट कार्ड लेकर उम्मीदवारों और पार्टियों के पास पहुंचे और समाचारों को बेचने का प्रस्ताव रखा तो देश में हलचल सी मच गई पत्रकारों और संपादकों के संगठनों मीडिया विनियामक चुनाव आयोग सूचना और प्रसारण मंत्रालय देश की संसद समेत कई मंचों पर इसे लेकर शोर मचा चुनाव के दौरान मीडिया के इस तरह बाजार में बिकने के लिए खड़े हो जाने और खबरों को लेकर आग लगाने को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए खतरा बताया गया और मांग उठने लगी इस पर अंकुश लगाया जाए विज्ञापन और खबर के बीच का अंतर खत्म हो जाने को लेकर गहरी चिंताएं जताई गई प्रेस परिषद की समिति ने इस बारे में जांच करके अपनी रिपोर्ट भी दे दी और उपचार भी बता दिया किया बीमारी कैसे दूर होगी।
झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो , सरकारी ऐलान हुआ है सच बोलो । राहत इंदौरी की यह पंक्तियां भला कौन भूल सकता है। और खासकर आज के दौर में तो बिल्कुल ही नहीं जब सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि सभी पहलू अपने नैतिकता नामक वस्त्र को छोड़ रहे हैं। यदि हम राहत इंदौरी की इन पंक्तियों को भारतीय राजनीति और भारतीय नेताओं से जोड़ दें तो किसी को अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। वैसे तो राजनीति में झूठ एक कारगर हथियार होता है लेकिन भारतीय राजनीति के मामले में यह परमाणु हथियार का काम करता है। यदि भारतीय राजनीति के इतिहास की बात करें तो प्राचीन काल में हम जा सकते हैं लेकिन फिलहाल स्वतंत्रता आंदोलन के पश्चात की राजनीति को ही देखने का प्रयास करते हैं। भारतीय लोकतंत्र की शुरुआत स्वतंत्रता आंदोलन से ही उभरी जो की नैतिकता से ओतप्रोत थी । जाहिर है आगाज बहुत बेहतरीन हुआ परंतु जैसे-जैसे यह आगे बढ़ता गया नए नए रास्ते निकलने लगे चुनाव जीतने के। इन तरीकों में राजनेताओं को सबसे ज्यादा जो तरीका भाया वह है झूठ का। राजनीति शास्त्र को जब हम एक विषय के रूप में पढ़ते हैं तो उसमें कई सारे उपविषय होते हैं जिनमे...
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