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21वी सदी में भारतीय मीडिया?

              21वीं सदी में भारतीय मीडिया

हमारे मीडिया में पैसा कमाने के लिए हाल में जिस तरह से राजनीति और आर्थिक खबरों को तोड़ा मरोड़ा गया यह प्रवृत्ति हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्था की छवि को ध्वस्त कर सकती है।
                          हामिद अंसारी( पूर्व उपराष्ट्रपति)

जब हम किसी कंपनी का कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल करते हैं तो शायद ही सोचते हो कि उसको क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं? साबुन क्यों इस्तेमाल करते हैं? कोल्डड्रिंक क्यों पीते हैं और पीते भी हैं तो किस कंपनी की पीते हैं क्या आपने खुद से पूछा ऐसा क्यों है? क्या आपको पता होता है कि आप जिस साबुन या कोल्ड ड्रिंक्स के ब्रांड का नाम लेकर खरीदारी करते हैं उनमें खास क्या है। क्या आपने कभी सोचा है कि किसी फिल्म के रिलीज होने से पहले पूरे देश में दर्शकों को कौन बताता है कि फिल्म का एडवांस टिकट खरीदना चाहिए या नहीं? किस कंपनी की गाड़ी लेनी है यह कैसे एक विचार बन जाता है।

                    अगर कोई पूछे कि कुछ या ढेर सारे लोगों को क्यों लगता है कि आतंकवाद इस देश की सबसे बड़ी समस्या है, ऐसे लोगों की नजर में इस देश में सिंचाई का बंदोबस्त पूरा न होना, किसानों की खाद भी सही कीमत पर ना मिल पाना, उपज के संग्रह का बंदोबस्त ना होना आज सबसे बड़ी समस्या क्यों नहीं है? जबकी खेती के बुरे हाल की वजह से किसानों की आत्महत्या दर बढ़ती जा रही है और जो भूख से मर रहे हैं वह अलग। या फिर देश की सबसे बड़ी समस्या यह क्यों नहीं है कि देश में हर साल 400000 लोग टीवी से मर जाते हैं जिन्हें शायद बचाया जा सकता है आतंकवादी तो हर साल कुछ तो लोगों को ही मारते हैं। ऐसे में 400000 लोगों की टाली जा सकने वाली मौत क्या हिंसा नहीं है? देश के किसी नेता के बारे में लोगों को कितना मालूम होता है कि वे उसे ईमानदार और साफ-सुथरी छवि वाला मानने लगते हैं? लगभग 1000000 मतदाता एक लोकसभा सीट पर होते हैं एक मतदाता कितने मतदाताओं से मिलकर अपनी राय बनाता है कि उसे किसे वोट डालना है? किसी को ऐसा क्यों लगता है कि चुनाव में खड़ा कोई उम्मीदवार बाकियों से ज्यादा ईमानदार है, विकास करने वाला है या फिर बाकी उम्मीदवारों से भारी है? कोई दूसरा उम्मीदवार उसके सामने कमजोर और बेईमान क्यों लगता है? 2019 के लोकसभा चुनाव में चुने गए कुल उम्मीदवारों में से 43% उम्मीदवार क्रिमिनल बैकग्राउंड से संबंधित है। फिर यह सवाल क्यों नहीं उठता?
   
                     दरअसल इन सारे और ऐसे ही अनेक सवालों का जवाब उस परिघटना में है जिसे एडवर्ड एस हरमन और नाम चोम्स्की मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट यानी आम सहमति गढ़ना कहते हैं। मास मीडिया का काम आम जनता तक संदेश और छवियों को पहुंचाना है। उसकी यह भूमिका बन गई है कि वह आम जनता को बहलाए, उसका मनोरंजन करें, उसे सूचना दे और व्यापक समाज के संस्थापक ढांचे में जनता को ढालने के लिए उसे मूली विश्वास और बर्ताव के तौर तरीके सिखाए। छवियों के बूते साबुन-तेल-टूथपेस्ट और तमाम तरह के उत्पाद बेचे जाते हैं, फ़िल्में और टीवी धारावाहिक बेचे जाते हैं, मनोरंजन बेचा जाता है, विचार बेचा जाता है, राजनीति बेची जाती है और 2019 के भारत के लोकसभा और पुरुषों के लिए हुए विधानसभा चुनाव में यह बात खुलकर सामने आई कि किस तरह किसी उम्मीदवार या पार्टी को भी मतदाताओं के बीच बेचा जा सकता है। 2019 के लोकसभा के साथ-साथ 2009 और 2014 के चुनाव और कुछ राज्यों के लिए हुए विधानसभा चुनाव के दौरान इसी का एक रूप पेड न्यूज़ या पैकेज पत्रकारिता की शक्ल में बड़े पैमाने पर नजर आया।

मीडिया विमर्श की भारतीय विशेषताएं:
                
                        भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और खासकर चुनाव में मीडिया का हस्तक्षेप और उसकी भूमिका बढ़ने की व्याख्या, लोग विमर्श के क्षय, आम सहमति के निर्माण, वर्चस्व यानी हेजेमनी, मास सोसायटी, मीडिया मोनोपोली जैसी सैद्धांतिकियों के दायरे में एक हद तक देखा और पढ़ा जा सकता है। भारतीय मीडिया और समाज के रिश्तो की कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जहां पश्चिम का मीडिया विमर्श या तो खामोश है या फिर कुछ वजह से सूत्र छोड़ता है। इन विशेषताओं के अध्ययन की परंपरा का विकास अभी होना है इसलिए भारतीय मीडिया विमर्श कितने सवालों के जवाब देने में सक्षम है उसे कई गुना ज्यादा सवाल और गुत्थियां अनसुलझी रह जाती हैं। मिसाल के तौर पर मौजूदा समय में भारतीय मीडिया के बहुचर्चित विषय पेड़ न्यूज़ कि पश्चिम में कोई समानांतर परंपरा नहीं है।
                       भारतीय मीडिया में न्यूज़ रूम डायवर्सिटी (यानी समाज के विभिन्न धार्मिक जातीय नस्लीय तबकों की न्यूज़ रूम में संख्या अनुपात के अनुसार मौजूदगी को लेकर भी चेतना और चर्चा का अभाव है जबकि पश्चिमी देशों में यह सवाल कम से कम 30-40 साल से चर्चा में है। जाति के प्रश्न पर भारतीय मीडिया की विशिष्ट दृष्टि और न्यूज़ रूम में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और मुस्लिमों की कम उपस्थिति के प्रश्नों के आधार पर कोई व्याख्या संभव नहीं है, क्योंकि यह भारत की और इस वजह से भारतीय मीडिया की विशेष समस्या। भारतीय मीडिया की विशेषताओं की बात करते समय सबसे पहले ध्यान पेड न्यूज़ के चलन पर पड़ जाता है। वर्तमान सदन में इसकी चर्चा राजनीतिक और खासकर चुनाव के दौरान किए गए पैकेज कवरेज को लेकर है।  यह प्रवृत्ति नई नहीं है और पेड न्यूज़ के दायरे में अगर कारोबारी और मनोरंजन क्षेत्र के पेड़ न्यूज़ को ले आए और भुगतान के दायरे को पैसे से बढ़ाकर राज्यसभा की सीट, पद्म पुरस्कार, जमीन, फ्लाइट सरकारी विज्ञापन, लाइसेंस, टैक्स ड्यूटी में छूट आज तक का डेट राजनीतिक पेड न्यूज को लेकर चौकाने का भाव खत नहीं तो कम जरूर हो जाएगा। इस नजरिए से 2009 में भारत में पेड न्यूज के जिस रूप का खुलेआम प्रदर्शन हुआ पेड न्यूज के परंपरागत रूपों का चुनाव के दौरान हुआ खुला विस्तार कहा जा सकता है।

क्या है पेड न्यूज़?

                     पेड न्यूज़ की कोई सांविधिमान्य परिभाषा नहीं है। चुनाव आयोग ने भारतीय प्रेस परिषद से कहा था कि वह पेड़ न्यूज़ को परिभाषित करे। पेड न्यूज को लेकर न्यायपालिका या चुनाव आयोग या प्रेस परिषद किसी भी तरह की कार्यवाही करे या किसी तरह के दिशा निर्देश दें, उससे पहले जरूरी है कि इस परिघटना की विधि सम्मत परिभाषा निश्चित कर ली जाए। इसका मतलब कोई समाचार जो दरअसल विज्ञापन की तरह छपा या दिखना चाहिए, अगर समाचार की तरह और समाचार की जगह पर या दिखे तो उसे पेड़ न्यूज़ कहेंगे। इसे बिकी हुई खबर भी कह सकते हैं। पेड न्यूज़ के साथ सुविधा यह है कि खरीदने वाला यानी नेता और बेचने वाला यानी अखबार या टीवी चैनल दोनों ही इस काम के लिए लेन-देन चुपचाप करना चाहते हैं। इस वजह से पेड न्यूज़ को चुनाव खर्च में शामिल ना करने में आसानी होती है। पेड न्यूज़ के में यह भी तय करना होगा कि क्या खबर के बदले में जब नगद या चेक से भुगतान किया जाए तभी से पेड न्यूज़ कहेंगे।

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