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मृतक का बैंक में जमा पैसा कैसे जानें?

आर्थिक नीतियों के बदलाव के पश्चात बैंकिंग प्रणाली कहीं ना कहीं हमारे लिए अति आवश्यक हो गई है। इसी बैंकिंग प्रणाली को लेकर तब कई सारे प्रश्न दिमाक में उठते हैं जब किसी खाता धारक की मृत्यु हो जाती है। जैसे मृत्यु के पश्चात बैंक खाते का क्या होता है ? क्या पैसा बैंक का हो जाता है? क्या बैंक उस पैसे को व्यक्ति के परिवार के किसी सदस्य को दे देता है? या फिर उसको किसी फंड में जमा कर दिया जाता है? दरअसल यह पैसा उसी अकाउंट में पड़ा रहता है और एक लंबे समय अंतराल के पश्चात ऐसे अकाउंट को निष्क्रिय घोषित कर दिया जाता है। कुछ दिन पहले भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट सामने आई जिसके अनुसार बैंकों में हजारों करोड़ रुपए ऐसे पड़े हैं जिनका कोई दावेदार ही नहीं है। ऐसा उन स्थितियों में होता है जब किसी खाता धारक की मृत्यु हो जाती है या फिर किसी के बहुत से बैंकों में खाते होते हैं। मौत होने की स्थिति में नॉमिनी पैसों के लिए दावा तो कर सकता है लेकिन कई बार नॉमिनी को खाते के बारे में जानकारी ही नहीं होती है। और यदि जानकारी होती भी है तो कुछ दस्तावेजों की कमी के वजह से भी दावा नहीं हो पाता है।भारतीय रिज...

क्या कांग्रेस महाधिवेशन से 2019 की नैया पार कर पाएगी?

2014 के लोकसभा चुनाव के पश्चात देश में केवल और केवल बीजेपी पार्टी ही नजर आ रही है खासकर उत्तर भारत में। जब भी किसी राज्य में चुनाव होते हैं तो  हमारे प्रधानमंत्री की रैलियों से वहाँ का पूरा वातावरण एक रंगीन माहौल में तब्दील हो जाता है। इस रंगीन माहौल को चुनाव परिणाम आने के पश्चात डिजिटल मीडिया और भी शानदार बना देता है। कई सारे टीवी एंकर बहस का एक तड़का भरा प्रोग्राम लेकर आ जाते हैं। एक घंटे रूपी इस धारावाहिक  प्रोग्राम में खूब शोर शराबा करते हैं। घर का बुजुर्ग चाय की चुस्की के साथ अपने को सक्रिय राजनीति में महसूस करता हुआ पाता है। और यदि इस समय घर की किसी महिला सदस्य का धारावाहिक प्रोग्राम प्रसारित हो रहा हो तो पूरी सक्रिय राजनीति घर की चारदीवारी में ही प्रारंभ हो जाती है। हाल ही में हुए उत्तर पूर्वी क्षेत्र के चुनाव नतीजों को लेकर जब टीवी शो पर जंग छिड़ी तब धारावाहिक प्रोग्राम लेकर आए एंकर साहब बड़े ही प्यार से भारत के नक्शे को एक रंगीन रूप में समाहित करने का प्रयास कर रहे थे। वह साहब बता रहे थे कि कितना क्षेत्र बीजेपी पार्टी के अधीन आ गया है? कितनी जनसंख्या पर अब वह शासन...

महिला सशक्तिकरण के मायने!!

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में जब कुछ बुद्धजीवियों द्वारा महिलावादी उपागम को मजबूती के साथ समाज में फैलाने का काम प्रारंभ किया गया। तो शायद सबको लगा होगा कि अब महिलाओं की स्थिति बदल जाएगी। अब वह समाज में व्याप्त स्त्री-पुरुष के भेदभाव से दूर हो जाएगी। अब वह अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर पाएगी। अब वह संपत्ति पर अपना हक जमा पाएगी। परंतु इतने सालों में महिला सशक्तिकरण के लिए किए गए कार्यों के पश्चात भी क्या कुछ बदला? आज भी भाषणों, किताबों, लेखों में सिर्फ बातें ही होती हैं और वास्तविक स्थिति एक भिन्न प्रकार से बदल रही है। इस स्थिति को हम 1 साल पहले आई संजय दत्त की भूमि फिल्म से समझ सकते हैं। इस फिल्म में संजय दत्त अपनी बेटी को बेटे से कमतर बिल्कुल नहीं मानता परंतु सामाजिक व्यवस्था के आगे वह बेबस हो जाता है। इस फिल्म ने भारतीय परम्परा की कुछ ना हजम होने वाली बातों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। इसमें दिखाया गया है कि जहां हम एक ओर स्त्री को देवी मानकर पूजा करते हैं वहीं दूसरी ओर गणेश जी की आरती "बांझन को पुत्र दे निर्धन को माया" में स्त्री को अत्...

PNB घोटाला और नीरव वापसी का जुमला

ब्रिटिश राज से जब हम आजाद भारत में प्रवेश हुए तब समानता रूपी अवधारणा प्रमुख थी। इसी अवधारणा को आधार बनाते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान के भाग तीन में मूल अधिकार के तहत सबको समानता प्रदान करने का प्रयास किया। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व कानूनी रूपी समानता की बात राजनेता से लेकर न्यायाधीशों की जुबान पर रहती है। परंतु जमीनी हकीकत में स्थिति अत्यंत भिन्न प्रकार से देखने को मिलती है। जब कोई साधारण व्यक्ति किसी बैंक से लोन लेने का प्रयास करता है तो उसको प्रारंभिक स्थिति से लेकर लोन प्राप्त होने की स्थिति के बाद तक अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है। बैंक मैनेजर से लेकर बैंक के चपरासी तक उस व्यक्ति को निचोड़ने में लग जाते हैं। बमुश्किल ही सही यदि लोन किसी प्रकार पास भी हो गया तो उसके पश्चात व्यक्ति का जीवन दोहरे डर में प्रारंभ हो जाता है। एक डर बैंक के पैसे को लौटाने का, जो व्यक्ति के जगने के साथ-साथ उसके नींद तक में समा जाता है और दूसरा डर व्यक्ति को सामाजिक तौर पर तोड़ने का काम प्रारम्भ कर देता है। डर हो भी क्यों ना क्योंकि 6 महीने के अंदर बैंक के कर्मचारी बीस हजार र...

हीरे का डर?

हीरे की तमन्ना लिए लोग ना जाने कितना चिंतन कर डालते होंगे क्योंकि हीरे की कुछ पहचान ही ऐसी है। कहते हैं कि हीरा अर्श से फर्श पर फेंकने में भी देरी नहीं करता। यह बात भले ही असहज लगे पर इतिहास के पन्नों में हीरा सबसे खतरनाक खलनायक रहा है। कल तक नीरव मोदी और मेहुल चोकसी हीरे का पर्याय हुआ करते थे परंतु आज उसी हीरे ने दोनों को कोयले के खान में झोंक दिया है। ऐश्वर्या और समृद्धि के लिए विख्यात हीरा एक पारदर्शी रत्न है। यह है तो सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ परंतु नाजुक दिलों को चुटकी में लूट लेता है। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में बात की जाए तो इसी हीरे के अनेक दीवाने हुए और उसी दीवानगी में सब कुछ लुटा गए। विश्व का नूर माना जाने वाला कोहिनूर लंदन से लेकर लखनऊ की छोटी छोटी गलियों में विख्यात है।शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो कोहिनूर को पाना ना चाहेगा। परंतु कोहिनूर का इतिहास इसे बेनूरियत रूपी कुर्ता पहना देता है। दरसल कोहिनूर जहां कहीं भी गया वहां के लोगों का दिल तो अवश्य लूटा परंतु साथ में दिल वालों को भी सदा के लिए लूट लिया। कोहिनूर ने जितना ज्यादा सफर किया उतना ही ज्यादा दुनिया को तबाह भी क...

मिथक: एक देश एक चुनाव

भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि तमाम विवादों और कलह के बाद भी लोकतांत्रिक प्रणाली में लोगों का भरोसा बरकरार है। इसी के इर्द गिर्द घूमते हुए देश उस समय एक नई बहस की ओर मुड़ गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने की बात कही। देश में फिलहाल अलग-अलग और लगातार चुनाव होते रहते हैं। इसमें पंचायतों के चुनाव भी शामिल हैं। अब जबकि चुनाव होते ही रहते हैं तो जाहिर है प्रत्येक चुनाव के लिए आचार संहिता लागू होगी जिससे लोगों का आम जनजीवन प्रभावित होगा। यही कारण है कि आचार संहिता रूपी पहलू को आर्थिक दृष्टि से जोड़कर चुनाव के खर्च को कम करने के लिए एक चुनाव की बात पर बल दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कुछ महानुभाव इतिहास का भी गुणगान करते हैं। बताते चलें कि 1952 से लेकर 1967 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते आए परंतु उसके पश्चात कुछ राज्यों में कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य पार्टियों की सरकारों का गठन हुआ और उनको सशक्त केंद्र के द्वारा गिराने का काम किया गया। यही कारण था कि 1967 के बाद एक साथ चुनाव संभव नहीं हो पाए। इसके अतिरिक्त स्वत...

मालदीव संकट और भारत।

शासन प्रणाली के सभी रूप अपने आप में एक बेहतर व्यवस्था को बनाने की बात करते हैं। परंतु लोकतंत्र शासन व्यवस्था का एक ऐसा उदाहरण है जो सभी में बेहतर है इसका  कारण शायद इस व्यवस्था में जनता को दिए गए ज्यादा से ज्यादा अधिकार व प्रदान की गई सकारात्मक स्वतंत्रता है। बेहतर होने के बावजूद दुनिया के कई देशों में आज भी लोकतंत्र स्थापित नहीं हो पाया है। इन देशों में खासकर मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले देश आते हैं और उनमें भी खाड़ी देश सबसे ऊपर। इसी का एक उदाहरण छोटे से द्वीप समूह से निर्मित मालदीव का है जो लोकतंत्र के अपने नवजात रूप में पनपना प्रारंभ ही हुआ था कि यहां के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन द्वारा लगाए गए आपातकाल ने नवजात को पनपने में अड़ंगा लगा दिया।                               दरसल अब्दुल्ला यमीन द्वारा 5 फरवरी 2018 को 15 दिन के लिए मालदीव में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। इससे मालदीव का चला आ रहा राजनीतिक संकट और गहरा गया। भारतीय विदेश मंत्...