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जाति और भारत

जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अरुणाचल से लेकर राजस्थान तक फैले भारत में सैकड़ों जातियों का निवास है। जाति भारतीय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग है।वर्तमान में आप बिना जाती व्यवस्था के भारत की कल्पना शायद नहीं कर पाएंगे। भारत की जाति व्यवस्था ने हिन्दू जीवन शैली के साथ-साथ मुस्लिम और ईसाई धर्म को भी प्रभावित किया है।
               इतिहास की बात की जाए तो प्राचीन व्यवस्था में जाति का कोई अस्तित्व नहीं था। घुमक्कड़ी जीवन से जब मनुष्य स्थायी जीवन की ओर अग्रसर हुआ तब व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ परिवर्तन करने पड़े।इसी क्रम में वर्ण व्यवस्था भी अस्तित्व में आयी। वर्ण व्यवस्था में काम के आधार पर लोगों को एक दूसरे से पृथक किया गया। इतिहासकारों का मानना है कि उस समय लोकतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी अतः किसी भी कार्य को करने के लिए लोग स्वतंत्र थे। इसप्रकार एक सामाजिक व्यवस्था ने जन्म ले लिया होगा। यहाँ यह प्रश्न दिमाक में आता है कि क्या कोई मनुष्य स्वेछा से किसी काम को करने लिए स्वयं राजी हो गया होगा या फिर उसे मजबूर किया गया ? यदि मनुष्य स्वेच्छा से किसी काम को करने के लिए तैयार  भी हो गया होगा परंतु फिर भी क्या वह भविष्य में उस काम के प्रति असहज महसूस नहीं किया होगा। क्या वह भविष्य में अपने काम को छोड़ कर किसी अन्य काम को करने के लिए स्वतंत्र था?  यदि वर्तमान व्यवस्था को देखा जाए जिसने देश को अंधकार की ओर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो उत्तर नहीं ही मिलेगा। प्रारम्भ में कुछ समय के लिए लोकतंत्र की बुनियाद स्वतंत्रता विद्यमान रही होगी परंतु जैसे-जैसे समय बीता लोग अपने विवेक के अनुसार एक दूसरे पर शासन प्रशासन करना प्रारम्भ कर दिया। 
                                 प्राचीन काल में जो विकल्प व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए बनाए गए वही भविष्य में घातक सिद्ध हुए। मध्य काल में जाति व्यवस्था ने अपना प्रचण्ड रूप धारण कर लिया। अब परछाई तक पड़ने पर उन लोगों को मारा जाने लगा जो लोग भूतकाल के समय साथ में रहते थे। शायद वह इतने विवेकशील नहीं थे कि पढ़ने लिखने से संबंधित कार्यों को करते। अंग्रेजी शासन के समय जाति व्यवस्था ने अहम भूमिका निभाई। अंग्रेज यहाँ की जाति व्यवस्था को हथियार बनाकर शासन को चलाने में सफल हुए। अंग्रेज धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांट कर देश लूट ले गए और हम आज भी जाति व्यवस्था के ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। अम्बेडकर की जीवनी पढ़ कर दुःख भी होता है परन्तु गाँधी जी के विचार मुझे  झकझोर भी देते हैं। अम्बेडकर के साथ जो हुआ वह अत्यंत दुर्लभ था परन्तु यदि एक विशेष तबके को लेकर चलने की बात हम करेंगे तो वह कभी भी हमारे लिए लाभदायक हो ही नहीं सकता। शायद यही कारण था कि गाँधी जी यरवदा जेल में अनशन पर बैठे।

                               वर्तमान में जब हम चाँद पर झण्डा लहरा रहे हैं बिश्व की तीसरी तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्था बन रहे हैं तब भी जाति धर्म के नाम पर लोगों को मारा जा रहा है। वह चाहे गुजरात की घटना हो या हरियाणा की या देश के किसी हिस्से की। जब देश आजाद हुआ तब देश को एकसूत्र में बांधने के लिये हमारे सविंधान सभा के सदस्यों ने प्रस्तावना में ही सब कुछ समाहित कर दिया। मौलिक अधिकार (अनुच्छेद14, 15,16,आदि) में लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक प्रावधान किए गए। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अनेक प्रावधान किए गए तथा अनुच्छेद338 और 338अ के तहत संवैधानिक आयोग भी बनाए गए। परंतु आज भी ऐसी स्थिति क्यों है कि लोगों के अंदर जातिवाद पनप रहा है? शायद अभी भी बहुत से लोगों की मनोवृत्ति रूढ़िवादी परम्परा से दूर नहीं हो पाई है। परंतु यहाँ यह जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि एक आर्थिक रूप से मजबूत अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ सामाजिक भेदभाव नहीं हो पाता। यही वजह है कि अभी भी आरक्षण समाप्त नहीं हो पाया है क्योंकि समाज अभी तैयार नहीं हो पाया है। 
               निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि वर्तमान में जाति व्यवस्था हमारे समाज में एक जहर की तरह फैली हुई है। इस समस्या के लिए कानून बनाने मात्र से काम नहीं चलेगा।हालाँकि आरक्षण तथा नियम कानून ने जाति व्यवस्था में अवश्य थोड़ा बहुत सुधार किया है परन्तु इसके लिए एक सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। जिस प्रकार राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा को दूर करने में सामाजिक आंदोलन चलाया और जिस प्रकार ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह से संबंधित सामाजिक आंदोलन चलाकर इस कुप्रथा को दूर किया उसी प्रकार हम भी जाति नाम की कुप्रथा को दूर कर सकते हैं।


                             




यह भी पढ़ें।।
पत्थरबाज और कश्मीर!!
https://salmanksath.blogspot.in/2017/12/blog-post.html?m=1
















Comments

  1. प्रिय सलमान जी--बिलकुल सही लिखते हैं आप | जाति प्रथा जहर है नासूर है समाज के लिए | पर इसे खत्म होने के लिए जाने कितनी साल लग जायेगे | अच्छा लिखा आपने | सस्नेह --

    ReplyDelete
  2. प्रिय सलमान जी--बिलकुल सही लिखते हैं आप | जाति प्रथा जहर है नासूर है समाज के लिए | पर इसे खत्म होने के लिए जाने कितनी साल लग जायेगे | अच्छा लिखा आपने | सस्नेह --

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  3. रेणु जी आपका बहुत बहुत आभार।।

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